Friday, May 24, 2024

बसपा का जनाधार बढ़ाना शिव कुमार दोहरे की चुनौती पार्टी के कैडर नेताओं ने सम्भाला मोर्चा, तेज किया जनसम्पर्क अभियान

हड़कंप इंटरनेशनल डेस्क

बसपा का जनाधार बढ़ाना शिव कुमार दोहरे की चुनौती

पार्टी के कैडर नेताओं ने सम्भाला मोर्चा, तेज किया जनसम्पर्क अभियान

पाटेश्वरी प्रसाद
बाराबंकी। लोकसभा चुनाव का शंखनाद होने के बाद बसपा उम्मीदवार भी ‘हाथी’ के साथ मैदान में आ डटा है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती लगातार घटते रहे जनाधार को फिर से सहेजने की है। बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार 1989 में बाराबंकी लोकसभा सीट पर विजय कुमार को चुनावी मौदान में उतारा था। इस चुनाव में वह तीसरे स्थान पर रहे। लेकिन यह चुनाव बसपा की राजनीतिक शुरूआत का अहम चुनाव साबित हुआ। इस चुपाव के बाद से बसपा ने लगातार प्रयोग किए और उम्मीदवार बदले। बावजूद इसके नतीजा आशा के अनुरूप नहीं रहा। चुनाव-दर-चुनाव हार के चलते आखिरकार साल 2004 में बसपा को कमला प्रसाद रावत के रूप में पहला सांसद मिला। वहीं 2019 के लोकसभा में बहुजन समाज पार्टी ने खुद का उम्मीदवार उतारने की जगह गठबंधन में सीट सपा के लिए छोड़ दी। जिस कारण बसपा समर्थित सपा प्रत्याशी रामसागर रावत को वोटो बढ़ोत्तरी तो हुई लेकिन वह चुनाव हार गए। इस बार अकेला चलो की नीति अपनाते हुए बसपा ने लखनऊ निवासी अधिवक्ता शिव कुमार दोहरे को चुनाव मैदान में उतारा है। शिव कुमार दोहरे सजातीय मतों पर कितना प्रभाव डाल पाएंगे यह तो चुनाव परिणाम बताएगा। सूत्रों की माने तो नामांकन से ठीक पहले बसपा जिलाध्यक्ष विक्रम गौतम को हटाकर के.के. रावत को जिलाध्यक्ष बनाने और शिव कुमार दोहरे को लोकसभा प्रत्याशी बनाने से दलित समाज में हो रहे बिखराव पर विराम लगेगा। बहरहाल, अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति बहुल सीट पर मुद्दों का टोटा हमेशा से दिखाई देता रहा है। विकास की बातें खूब होती हैं, लेकिन गांव ही नहीं शहरी इलाकों में भी विकास नहीं दिखाई देता है। हर पार्टी अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जाति के लिए योजनाओं की बातें ही करती है। योजनाएं आती भी हैं, लेकिन उसका फायदा बिचौलिए ही ले जाते दिखाई देते हैं। ऐसे में बसपा की रणनीति से सियासी गलियारे में चर्चा बनी हुई है। वहीं बसपा के रणनीतिकारों की मेहनत कितनी सफल होती है और बसपा का संगठन कितनी मजबूती से शिव कुमार दोहरे को चुनाव लड़ाता है, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। ऐसे में श्री दोहरे को यह साबित करना होगा कि वह सजातीय मतों पर कितना प्रभाव डाल पाते हैं, क्योंकि लगातार खिसक रहे जनाधार से वोटरों के बीच भरोसा जताकर हाथी को संसद की दहलीज तक पहुंचा पाना उनके लिए आसान नहीं है।

बसपा का चुनावी इतिहास

लोकसभा चुनाव में चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 1989 में बसपा का राजनीतिक सफर शुरू हुआ। इस साल हुए चुनाव में बसपा प्रत्याशी विजय कुमार को 76834 मत प्राप्त हुए। वहीं साल 1991 में बसपा ने शत्रोहन लाल गौतम को चुनाव में उतारा। उन्हें महज 48418 मत ही प्राप्त हुए। साल 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में बसपा ने एक बार फिर प्रत्याशी के चयन में बदलाव करते हुए आनन्द प्रकाश गौतम को टिकट दिया। वह भी चुनाव हार गए, उन्हें 86001 मत प्राप्त हुए। वहीं साल 1998 के चुनाव में बसपा ने फिर प्रत्याशी बदला। इस बार उन्होंने राम दुलारे रावत को टिकट दिया। वह भी चुनाव हार गए लेकिन बसपा के जनधार में बढ़ोत्तरी कर गए। उन्हें 101518 मत मिले। फिर अगले साल यानी 1999 के चुनाव में बसपा से संत बली सिद्धार्थ पर भरोसा जताया। उन्हें पिछले चुनाव से ज्यादा वोट मिले। वह भी 109472 मत पर चुनाव हार गए। लगातार प्रयोग के बाद आखिरकार बसपा को साल 2004 में सफलता मिली। जब दिग्गज कांग्रेसी नेता एवं पूर्व सांसद कमला प्रसाद रावत को बसपा ने चुनाव में उतारा। श्री रावत ने मायावती के भरोसे को कायम रखा और उन्होंने 196370 मत पाकर अपनी जीत सुनिश्चित की। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा सुप्रीमों मायावती ने एक बार फिर कमला प्रसाद रावत पर भरोसा जताया, लेकिन वे चुनाव हार गए। इस चुनाव में उन्हें 159837 मत मिले। यहीं से जनाधार के क्षरण का सिलसिला शुरू हुआ, जो 2019 तक जारी रहा। वहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में तीसरी बार बसपा ने कमला प्रसाद रावत को टिकट दिया लेकिन वह फिर चुनाव हार गए। इस चुनाव में उन्हें 167150 वोट मिले। वहीं साल 2019 में जब सपा-बसपा का गठबंधन हुआ तो पार्टी सुप्रीमो मायावती ने यहां से उम्मीदवार उतारने की जगह समाजवादी के खाते में ही सीट छोड़ने का फैसला किया। लेकिन बसपा समर्थित सपा प्रत्याशी रामसागर रावत जनता को प्रभावित नहीं कर पाए और चुनाव हार गए। सूत्रों की माने तो इस चुनाव में बसपा का कैडर वोट भाजपा में जाता देखा गया। जिस कारण भाजपा प्रत्याशी की अप्रत्याशित जीत हुई।

रणनीति बनाकर काम करना हो काम : अजय 

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो अब जाति आधारित राजनीति को लोग नकार रहे हैं। दलित को बसपा का वोट बैंक माना जाता रहा है। बीते कुछ चुनावों में यह खिसकता नजर आता है। आंकड़े बताते हैं कि इसकी गिरावट को रोकने में किए गए प्रयोग भी असफल रहे हैं। वोट बैंक सहेजना आसान नहीं रह गया है। ऐसे में बसपा जोनल कोआडिनेटर अजय गौतम बताते हैं कि बसपा को बूथ स्तर पर अपनी रणनीति बनाकर काम करना होगा। बसपा कार्यकर्ताओं को गांव गांव जाकर भाजपा की गलत नीतियों को उजागर करके बसपा के संदेश को पहुंचाना होगा ताकि चुनाव में बसपा निर्णायक भूमिका में नज़र आए।

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